दिल्ली प्रदर्शन, बिहार सरकार और यूपी चुनाव को लेकर सहयोगी दल के तेवरों ने बढ़ाई सियासी हलचल
रवीन्द्र त्रिपाठी
नई दिल्ली। भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के हालिया बयानों ने गठबंधन की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर चिराग भाजपा के साथ गठबंधन में बने रहने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन, बिहार की कानून-व्यवस्था और उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे जैसे मुद्दों पर उनके अलग तेवर एनडीए के लिए नई चुनौती बन रहे हैं। दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले ट्रेनों और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों को लेकर चिराग ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को रोका नहीं जा सकता और सवाल किया कि आखिर कितनी ट्रेनों को रोका जाएगा। उनका यह बयान ऐसे समय आया, जब विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहा था। इससे एनडीए के भीतर सहयोगियों के अलग-अलग रुख को लेकर चर्चा तेज हो गई। बिहार में भी चिराग पासवान राज्य सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाकर अपनी ही गठबंधन सरकार को असहज कर चुके हैं। वहीं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर उनकी पार्टी ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। चिराग ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने को प्राथमिकता देने की बात कही है, लेकिन सीटों की मांग को लेकर पार्टी की सक्रियता भाजपा के सामने सहयोगियों के साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौती खड़ी कर सकती है। सवाल यह है कि चिराग के ये तेवर एनडीए के भीतर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की रणनीति हैं या सहयोगी दल के रूप में अपनी मांगों को मजबूती से रखने का तरीका? फिलहाल, उनके बयानों से इतना स्पष्ट है कि गठबंधन में साथ होने का अर्थ हर मुद्दे पर एक जैसी राय होना नहीं है। आने वाले दिनों में भाजपा और चिराग पासवान के बीच समन्वय तथा उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे पर होने वाली बातचीत इस रिश्ते की दिशा तय करने में अहम होगी।
