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जब नाम ही बन जाएं मजाक, तो व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक

 

रवीन्द्र त्रिपाठी

मतदाता सूची में ‘राम ने शर्मा को मारा’, ‘टक्कर मारना’, ‘बीकॉम’ और ‘फैज अब्बास ने कहा’ जैसी प्रविष्टियां सामने आने का दावा अपने आप में चौंकाने वाला है। इन नामों के पीछे तकनीकी प्रक्रिया, डेटा एंट्री या अनुवाद संबंधी त्रुटि हो सकती है, लेकिन यही संभावना एक और महत्वपूर्ण सवाल पैदा करती है—क्या डिजिटल प्रणाली पर निर्भर रहने के साथ मानवीय सत्यापन की व्यवस्था कमजोर पड़ गई है?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ‘राम ने यादव को मारा’ जैसी प्रविष्टि के पीछे अंग्रेजी में ‘रामहित यादव’ नाम को गलत तरीके से टाइप करने और सॉफ्टवेयर द्वारा उसका अनुचित अनुवाद किए जाने की आशंका बताई गई है। इसी तरह, किसी व्यक्ति के पिता के नाम वाले कॉलम में ‘बीकॉम’ दर्ज होना डेटा एंट्री अथवा रिकॉर्ड के गलत मिलान की ओर संकेत करता है। हालांकि, प्रत्येक मामले में वास्तविक कारण की पुष्टि संबंधित मूल आवेदन और अभिलेखों की जांच से ही हो सकती है। “हिन्दुस्तान”,”हिंदी समाचार प्रकाशन”की रिपोर्ट में भी इन विसंगतियों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया का उल्लेख है।
समस्या यह नहीं है कि किसी सरकारी रिकॉर्ड में गलती हो ही नहीं सकती। समस्या यह है कि जिस दस्तावेज के आधार पर लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल होना है, उसमें स्पष्ट रूप से असामान्य प्रविष्टियां अंतिम सूची तक कैसे पहुंच गईं? यदि कंप्यूटर में दर्ज जानकारी को बिना जांच के स्वीकार कर लिया गया, तो यह तकनीक की नहीं, बल्कि पूरी कार्यप्रणाली की विफलता मानी जाएगी।

150 से कम त्रुटियां, लेकिन सवाल बड़ा

निर्वाचन अधिकारियों की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में 150 से कम मतदाताओं के नाम अथवा उनके परिजनों के नाम में त्रुटियां बताई गई हैं। कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 14.81 लाख बताई गई है। अधिकारियों के अनुसार, यह संख्या कुल मतदाताओं का लगभग 0.01 प्रतिशत है। आंकड़ों के लिहाज से इन त्रुटियों का अनुपात छोटा हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र में किसी गलती का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि उससे कितने लोग प्रभावित हुए। एक भी पात्र मतदाता का नाम गलत दर्ज होने से उसे मतदान के समय परेशानी हो सकती है। दूसरी ओर, गलत या दोहराए गए रिकॉर्ड चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर संदेह पैदा कर सकते हैं। इसलिए कम प्रतिशत का हवाला देकर मामले को पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं होगा। उतना ही अनुचित होगा कि केवल कुछ वायरल पर्चियों के आधार पर पूरे निर्वाचन तंत्र को दोषी ठहरा दिया जाए। उचित रास्ता है—तथ्यों की जांच, त्रुटियों का वर्गीकरण और जिम्मेदारी का निर्धारण।

डुप्लीकेट मतदाताओं का मामला भी कम गंभीर नहीं

इस विवाद में एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। झांसी मंडलायुक्त की जांच से संबंधित मीडिया रिपोर्टों में 100 से अधिक डुप्लीकेट मतदाता प्रविष्टियों का उल्लेख है। इनके लिए अलग सूची तैयार करने और मतदान केंद्रों पर सतर्कता बरतने की बात कही गई है। यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। किसी मतदाता का नाम सूची में दो बार होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसने फर्जी मतदान किया है या ऐसा करने की मंशा रखता है। डुप्लीकेट प्रविष्टि तकनीकी गलती, नाम के अलग-अलग रूप में दर्ज होने या रिकॉर्ड के दोहराव से भी पैदा हो सकती है। वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही सामने आ सकती है। लेकिन यदि दोहराए गए नामों की समय रहते पहचान नहीं होती, तो मतदान के दौरान भ्रम और अनियमितता की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए केवल सूची तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक प्रविष्टि की जांच हो, संबंधित मतदाता की पहचान स्पष्ट हो और कानून के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए जाएं।

निर्वाचन आयोग की जवाबदेही क्यों महत्वपूर्ण है?

मतदाता सूची तैयार करने और उसका सत्यापन करने की प्रक्रिया में अनेक स्तरों पर अधिकारी तथा कर्मचारी जुड़े होते हैं। आवेदन प्राप्त करने, दस्तावेजों का मिलान करने, जानकारी दर्ज करने और अंतिम सूची प्रकाशित करने तक हर चरण की अपनी जिम्मेदारी होती है। यदि कोई नाम गलत दर्ज हुआ, तो सबसे पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि त्रुटि किस स्तर पर हुई। क्या आवेदन में जानकारी सही थी और उसे दर्ज करते समय गलती हुई? क्या अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करते समय नाम का अर्थ बदल गया? क्या किसी दूसरे कॉलम की सामग्री गलत जगह चली गई? या फिर सत्यापन के दौरान असामान्य प्रविष्टियों पर ध्यान ही नहीं दिया गया?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही जिम्मेदारी तय की जा सकती है। यदि लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसी त्रुटियां रोकने के लिए कौन-से सुधार किए जाएंगे। मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के निर्देश पर जांच कराए जाने और रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं। यह कदम जरूरी है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता इस बात से तय होगी कि जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक होते हैं या नहीं और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई होती है या नहीं। क्या डिजिटल व्यवस्था में मानवीय निगरानी कमजोर पड़ गई? मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया को ऑनलाइन करना प्रशासनिक दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। इससे आवेदन दर्ज करने, रिकॉर्ड खोजने और संशोधन करने में सुविधा मिलती है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था तभी विश्वसनीय बनती है, जब उसमें दर्ज जानकारी की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। सॉफ्टवेयर शब्दों को पहचान सकता है, उनका अनुवाद कर सकता है और रिकॉर्ड में समानता खोज सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति का नाम असामान्य दिखाई देने पर उसकी वास्तविकता की पुष्टि करने के लिए मानवीय जांच की जरूरत पड़ सकती है। खासकर भारतीय भाषाओं, स्थानीय नामों, उपनामों और अंग्रेजी में लिखे गए भारतीय नामों के मामले में गलत लिप्यंतरण या अनुवाद की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए निर्वाचन व्यवस्था में ऐसी जांच प्रणाली होनी चाहिए, जो असामान्य नामों, संदिग्ध अनुवादों, खाली विवरणों और एक जैसे रिकॉर्ड को स्वतः चिह्नित करे। इसके बाद संबंधित अधिकारी मूल आवेदन और पहचान संबंधी दस्तावेजों से उनका सत्यापन करें।
यह तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि तकनीक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल की मांग है।

विपक्ष के सवाल और राजनीतिक आरोपों की कसौटी

विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में सामने आई विसंगतियों को लेकर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। इन सवालों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में उठाना उनका अधिकार है। लेकिन राजनीतिक आरोप और प्रमाणित तथ्य दो अलग चीजें हैं। यदि विपक्ष का दावा है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है, तो उसे विशिष्ट उदाहरणों, रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्षों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए। इसी तरह, निर्वाचन आयोग और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे केवल यह कहकर न रुकें कि त्रुटियों का अनुपात बहुत कम है। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि गलती कैसे हुई, उसका दायरा कितना है और उसे सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। मतदाता सूची में गड़बड़ी सामने आने का अर्थ अपने आप में चुनाव में धांधली साबित होना नहीं है। लेकिन प्रमाणित त्रुटियों को गंभीरता से न लेना भी व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास कमजोर कर सकता है।

सबसे जरूरी है मतदाता के अधिकार की रक्षा

निर्वाचन अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वास्तविक मतदाता की पहचान सही पाई जाती है, तो केवल नाम या अन्य विवरण में लिपिकीय त्रुटि होने के कारण उसे मतदान से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रशासनिक गलती की सजा उस नागरिक को नहीं मिलनी चाहिए जिसने नियमानुसार पंजीकरण कराया है। मतदान केंद्र पर अधिकारियों को पहचान की पुष्टि के लिए स्पष्ट निर्देश मिलने चाहिए, ताकि मतदाता को अनावश्यक परेशानी न हो।
साथ ही, जहां डुप्लीकेट या संदिग्ध प्रविष्टियां हैं, वहां नियमों के अनुरूप जांच और निगरानी की व्यवस्था भी जरूरी है। निष्पक्षता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि सही मतदाता का अधिकार सुरक्षित रखना भी है।

हंसी का विषय नहीं, सुधार का अवसर

‘राम ने शर्मा को मारा’ और ‘टक्कर मारना’ जैसे नाम पहली नजर में हास्यास्पद लग सकते हैं। सोशल मीडिया पर इनका मजाक उड़ना भी स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे प्रकरण को केवल चुटकुला बनाकर छोड़ देना असल समस्या से आंखें मूंदने जैसा होगा। मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारभूत व्यवस्था है। इसमें दर्ज हर नाम की शुद्धता, पहचान और पात्रता का महत्व है। यदि तकनीकी या मानवीय त्रुटियों के कारण गलत प्रविष्टियां अंतिम सूची तक पहुंच रही हैं, तो यह व्यवस्था में सुधार की स्पष्ट चेतावनी है। निर्वाचन आयोग के सामने अब तीन प्रमुख जिम्मेदारियां हैं—पहली, सामने आई सभी त्रुटियों की पारदर्शी जांच; दूसरी, जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका का निष्पक्ष निर्धारण; और तीसरी, भविष्य में ऐसी गलतियां रोकने के लिए सत्यापन प्रणाली को मजबूत करना। लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान केंद्र पर शांतिपूर्ण मतदान से सुनिश्चित नहीं होती। उसकी शुरुआत मतदाता सूची से होती है। इसलिए जरूरी है कि इस मामले में जवाबदेही भी तय हो और किसी पात्र मतदाता का अधिकार भी प्रभावित न हो। आखिरकार, मतदाता सूची में नाम गलत होना महज एक लिपिकीय भूल हो सकती है, लेकिन ऐसी भूलों को रोकने और सुधारने में विफलता प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन जाती है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए इस सवाल का जवाब मिलना जरूरी है।