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भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अफसर को एक्सटेंशन की आस!

 

25 लाख की कथित सेटिंग, सरकारी बंगले का मोह और सिस्टम की परीक्षा

रवीन्द्र त्रिपाठी

रायपुर।सरकारी सेवा में उत्कृष्ट काम करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, लेकिन यदि किसी अधिकारी के कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोपों और विवादों के बादल मंडरा रहे हों और फिर भी उसे सेवा विस्तार दिलाने की कोशिशों की चर्चा हो, तो सवाल उठना लाजिमी है। छत्तीसगढ़ के एक विभाग में इन दिनों कुछ ऐसा ही मामला चर्चाओं में है। चर्चा है कि कथित तौर पर 20 से 25 लाख रुपये खर्च कर अधिकारी के लिए एक्सटेंशन की राह आसान बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इस कथित लेन-देन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वास्तव में सेवा विस्तार के लिए कोई आर्थिक खेल चल रहा है, या फिर यह महज अफवाह है? यदि मामला गंभीर है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा?

विधानसभा में भी उठा था मामला!

यह अधिकारी पहले भी विवादों में रहा है। बताया जाता है कि ट्रैक्टर खरीदी से जुड़ा मामला विधानसभा में उठा था और तत्कालीन मंत्री ने भी इस पर सवाल किए थे। अधिकारी की निलंबन अवधि और उस दौरान सरकारी वाहन अपने पास रखने के आरोप भी चर्चा में रहे हैं। इन घटनाओं से जुड़े दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध पहले गंभीर सवाल उठ चुके हैं, तो उसके सेवा विस्तार पर विचार करते समय उन मामलों की स्थिति स्पष्ट करना शासन की जिम्मेदारी है। आखिर सेवा विस्तार केवल पद पर बने रहने का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता और जनहित से भी जुड़ा प्रश्न है।

सरकारी बंगले का मोह या पद पर बने रहने की चाह?

चर्चाओं में यह भी दावा किया जा रहा है कि अधिकारी सरकारी बंगले की सुविधा बनाए रखना चाहता है, जिसकी बाजार में अनुमानित किराया कीमत करीब एक लाख रुपये प्रतिमाह बताई जा रही है। हालांकि, बंगले के वास्तविक किराये, आवंटन की शर्तों और अधिकारी की पात्रता की पुष्टि आवश्यक है।सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी का कार्यकाल पूरा होने वाला है, तो क्या सेवा विस्तार का आधार जनहित और प्रशासनिक आवश्यकता होगी या फिर पद और सरकारी सुविधाओं को बनाए रखने की इच्छा?

अब मुख्यमंत्री की नीति की परीक्षा

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार के खिलाफ घोषित रुख के अनुरूप सुशासन और पारदर्शिता की बात करती है। ऐसे में इस प्रकरण में सरकार की नीति और प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी नजर रहेगी।
यदि अधिकारी के विरुद्ध लगे आरोप निराधार हैं, तो तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोपों के पीछे ठोस दस्तावेज और गंभीर अनियमितताएं हैं, तो उन्हें नजरअंदाज कर सेवा विस्तार देना कई सवाल खड़े कर सकता है।

एक्सटेंशन मिलेगा या लगेगा विराम?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि संबंधित अधिकारी को सेवा विस्तार मिलता है या उसकी राह में नियम और जवाबदेही बाधा बनते हैं। क्या फैसला प्रशासनिक जरूरत, पात्रता और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर होगा, या फिर पर्दे के पीछे चल रही कथित जोड़तोड़ सफल होगी?
अब निगाहें शासन के फैसले पर हैं। यदि भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच सेवा विस्तार की कोशिशें हो रही हैं, तो सरकार को पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आखिर सुशासन का असली अर्थ केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ बयान देना नहीं, बल्कि विवादित मामलों में निष्पक्ष और नियमसम्मत निर्णय लेना भी है।