एडिटर: रवीन्द्र त्रिपाठी
नेपाल/ गोरखपुर। नेपाल के रासुवा जिले में भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र की आपदा-जोखिम की भयावह तस्वीर सामने रख दी है। यह सामान्य मानसूनी बाढ़ नहीं थी। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर/बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से नदी का प्रवाह अचानक बाधित हुआ और उसके बाद पानी तथा मलबे की विनाशकारी लहर नीचे की ओर दौड़ी।
नेपाल सरकार के 27 अगस्त के आधिकारिक अपडेट के अनुसार उस समय तक 359 शव बरामद किए जा चुके थे और 33 देशों के 596 लोग लापता बताए गए थे। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि आंकड़े खोज एवं बचाव अभियान के साथ बदल सकते हैं। बाद की रिपोर्टों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या और बढ़ी है। 28 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार नेपाल और तिब्बत में संयुक्त रूप से मृतकों की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है और बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता हैं। इसलिएआंकड़ों को अंतिम मानना जल्दबाजी होगी। यह सिर्फ बाढ़ नहीं, हिमालय की चेतावनी है।इस त्रासदी को केवल भारी बारिश या मानसून की प्राकृतिक घटना बताकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ी भूल होगी। हिमालय दुनिया के सबसे तेजी से बदलते पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ और चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है तथा ग्लेशियल झीलों के फटने और अचानक बाढ़ आने का खतरा बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने इस घटना को भी हिमनदों और ऊंचाई वाले पर्वतीय भूभाग की बढ़ती अस्थिरता के संदर्भ में देखा है। नेपाल पिछले तीन दशकों में अपने ग्लेशियरों की बर्फ का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खो चुका है—यह आंकड़ा बताता है कि हिमालय का संकट केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है।
विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
नेपाल की अर्थव्यवस्था में सड़क, पुल, जलविद्युत, पर्यटन और सीमा व्यापार की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन हिमालयी भूगोल में विकास का अर्थ सिर्फ सड़क और सुरंग बनाना नहीं हो सकता। फ्लैश फ्लड ने सड़कों, पुलों, घरों, बिजली परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार दर्जनों पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त या नष्ट हुईं। यहीं से असली सवाल उठता है—क्या हिमालय में विकास की परियोजनाएं जलवायु और आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं? यदि नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में निर्माण होगा, पहाड़ों को लगातार काटा जाएगा, ढलानों पर दबाव बढ़ेगा और परियोजनाओं का पर्यावरणीय मूल्यांकन केवल कागजी प्रक्रिया बन जाएगा, तो किसी दिन प्राकृतिक घटना विकास की पूरी संरचना को अपने साथ बहा सकती है।
चेतावनी प्रणाली पर भी गंभीर सवाल
नेपाल सरकार ने बचाव अभियान में सेना, पुलिस, हेलीकॉप्टर और अन्य एजेंसियों को लगाया है। विदेशी नागरिकों की सहायता और सूचना के लिए विदेश मंत्रालय ने अलग आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम भी बनाई है।
लेकिन इतनी तेजी से आने वाली फ्लैश फ्लड में कुछ मिनटों की चेतावनी भी सैकड़ों जिंदगियां बचा सकती है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि बाढ़ के बाद कितने हेलीकॉप्टर भेजे गए। सवाल यह होना चाहिए कि बाढ़ आने से पहले नदी, ग्लेशियर और पहाड़ी ढलानों की निगरानी कितनी प्रभावी थी? क्या संवेदनशील गांवों, पर्यटन मार्गों और जलविद्युत परियोजनाओं तक वास्तविक समय में चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था थी?
भारत के लिए भी खतरे की घंटी
नेपाल की यह त्रासदी भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। नेपाल की नदियां आगे चलकर भारत में प्रवेश करती हैं। हिमालयी क्षेत्र में अचानक आने वाली बाढ़ का प्रभाव बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
इसी वजह से भारत ने नेपाल की बाढ़ के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार को हाई अलर्ट पर रखा तथा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल की अतिरिक्त टीमों की तैनाती की खबर सामने आई। इस घटना ने भारत-नेपाल के बीच रियल-टाइम हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने, ग्लेशियर निगरानी, संयुक्त चेतावनी प्रणाली और सीमा-पार आपदा प्रबंधन की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है। पर्यटन और तीर्थयात्रा भी बने जोखिम क्षेत्र हिमालय केवल गांवों और शहरों का क्षेत्र नहीं है। यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक, ट्रेकर्स और तीर्थयात्री पहुंचते हैं। इस आपदा में भी कई विदेशी नागरिकों के लापता होने की खबर है। इससे एक और प्रश्न पैदा होता है—क्या पर्यटन व्यवस्था पर्यटकों की संख्या बढ़ाने पर जितना जोर देती है, उतना ही आपदा सुरक्षा पर भी देती है? हिमालय में मौसम कुछ घंटों में बदल सकता है। जिस रास्ते पर सुबह सैकड़ों लोग चल रहे हों, वह शाम तक नदी या मलबे की धारा में बदल सकता है। इसलिए पर्यटन नीति को अब केवल होटल, सड़क और प्रचार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। असली त्रासदी बाढ़ के बाद शुरू होगी।बाढ़ का पानी उतर जागा, लेकिन तबाही का असर वर्षों रह सकता है। घर टूटेंगे। सड़कें कटेंगी। पुलों के अभाव में गांव अलग-थलग पड़ेंगे। बिजली और संचार व्यवस्था बहाल करने में समय लगेगा। छोटे दुकानदारों, किसानों, होटल संचालकों और मजदूरों की आय प्रभावित होगी। बच्चों की शिक्षा बाधित होगी और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा। आधिकारिक अपील में भी नेपाल सरकार ने तत्काल राहत के साथ प्रभावित लोगों के दीर्घकालीन पुनर्वास को जरूरी बताया है।इसलिए राहत का अर्थ केवल भोजन के पैकेट और अस्थायी तंबू नहीं होना चाहिए। पुनर्निर्माण की योजना में सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास, मजबूत पुल-सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, संचार व्यवस्था और आजीविका की बहाली शामिल होनी चाहिए।
हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की जरूरत है।
नेपाल की तबाही हमें एक कठोर संदेश देती है—प्रकृति से लड़कर विकास संभव नहीं है।
हिमालय को केवल खनिज, पर्यटन, जलविद्युत और सड़क परियोजनाओं का संसाधन मानने की सोच बदलनी होगी। पहाड़ों की अपनी वहन क्षमता है। नदियों के अपने रास्ते हैं। ग्लेशियरों की अपनी संवेदनशीलता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बीते 50 वर्षों के मौसम के आधार पर अगले 50 वर्षों की योजना बनाना खतरनाक होगा। अब जरूरत है हर संवेदनशील ग्लेशियर और ग्लेशियल झील की निरंतर निगरानी की। भारत-नेपाल-चीन हिमालयी क्षेत्र में वैज्ञानिक डेटा साझाकरण की। नदी घाटियों के लिए रियल-टाइम फ्लैश-फ्लड चेतावनी प्रणाली की। पुल, सड़क, सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन में नए जलवायु जोखिमों को शामिल करने की। पर्यटन एवं तीर्थयात्रा के लिए अनिवार्य आपदा सुरक्षा प्रोटोकॉल की। संवेदनशील बस्तियों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्वास करने की। आपदा के बाद मुआवजे के बजाय पूर्व-आपदा तैयारी पर अधिक खर्च करने की।
यह नेपाल की त्रासदी भर नहीं
नेपाल में आया यह सैलाब किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरे हिमालय और दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी है। आज भोटेकोशी और त्रिशूली घाटियां प्रभावित हुई हैं, कल कोई दूसरी हिमालयी नदी अचानक उग्र हो सकती है। आज नेपाल में तबाही हुई है, कल उसका पानी भारत के मैदानी इलाकों में संकट पैदा कर सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हिमालय में प्राकृतिक आपदाओं की गति बढ़ रही है, जबकि हमारी तैयारी उसी गति से नहीं बढ़ी है। इसलिए इस आपदा के बाद केवल संवेदना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होगा। नेपाल को राहत चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा उसे नई आपदा-नीति, वैज्ञानिक निगरानी और सुरक्षित विकास मॉडल चाहिए। भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया को यह समझना होगा कि हिमालय अब केवल बर्फ का पहाड़ नहीं रहा—वह बदलती जलवायु का सबसे संवेदनशील अलार्म बन चुका है।
